Friday, September 8, 2017

जाने कितनों का घर उजाड़ा मैंने,,,,एक वृक्ष को काटकर के

जाने कितने पाप किये,,,सारे अपने आप किये,,
इसको तोड़ा,, उसको मरोड़ा,,कितनों को झकझोर दिए,,
हरियाली से रही घृणा,
मन की ना मिट पायी तृष्णा,,
प्यास थी जाने कैसी वो,,
पशुओं,,पक्षियों के श्राप लिए,,,
कल बाग़ हुआ करती थी यहाँ,,
गोरैया की किलकारी थी,,,
जब भी गुजरता था उस राह में तो,,
गिलहरी की देखती रहती थी,,,
चींटियों का भी झुण्ड,,उस राह से रोज गुजरता था,,
बिन शब्द कहे,,मैं बिन बोले,,जाने क्या बाते करता था,,
पक्षी भी थे,,गिलहरी थी,,चींटी भी थीं,, घोंसले भी थे,,
शायद ये उनका साथ ही था,,उनको मुझपर विस्वास भी था,,
उन पेड़ों उनका घरौंदा था,,,जिनको हमने काट दिए,,
वो रोये बहुत चिल्लाये थे,,,हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाए थे,,
हम हज़ारों है हम कहाँ जाये,,
जिन घोंसलों को बनाया है,,
इस पेड़ को मैंने सजाया है,,
इनमे मेरे अपने है,,,जाने कितनों के सपने है
जीवन भर का अरमान है
और इसमें बसे हमारे प्राण है
मैं था मनुष्य,,,था प्रतिघाती,,
विस्वास से मुझे था क्या लेना,,
मैंने उन पेड़ो को काट दिया,,
उन हज़ारों रोते हुए जीवों के,,,
हाँ जीवन में अन्धकार किया,,

जाने कितने पाप किये,,,सारे अपने आप किये,,
इसको तोड़ा,, उसको मरोड़ा,,कितनों को झकझोर दिए,,

जो पेड़ कल वायु के वेग के संग हँस रहे थे,,,मुश्करा रहे थे,,आज सीशविहीन रुदन कर रहे है Nirmal earthcarefoundation

जो पेड़ कल वायु के वेग के संग हँस रहे थे,,,मुश्करा रहे थे,,आज सीशविहीन रुदन कर रहे है
Nirmal earthcarefoundation

प्रकृति को क्षत-विक्षत करना आज की परंपरा बन गयी है Nirmal Earthcarefoundation Ngo

प्रकृति को क्षत-विक्षत करना आज की परंपरा बन गयी है
Nirmal Earthcarefoundation Ngo