हमारी प्रकृति,,,इसकी,,सुंदरता सच में जाने कितने सुखद एहसासों का जन्म होता है,,,जिनमे बहकर या इसके समीप रहकर हम भी मिश्री की तरह जल में जैसे निश्छल रूप से घुल जाते है और उसमें से हम या वो अर्थात विलेय और विलायक मिलकर एक ऐसा विलयन बनाते है,,,की जिसके कण कण में मैं,,मैं घुलकर हम बन जाते है ,,और इसमें से मैं को मैं से पृथक करना जैसे असंभव हो जाता है,,,,,और इसमें खोकर हम अपने सारे आकार,, विकार भूल जाते है,,इसलिए मुझे प्रकृति एक सम्मोहन शास्त्र की तरह लगती है ,,,,जिसका सानिध्य सिर्फ सुखद अनुभवो का एहसास कराता है,,,,
जय श्री कृष्णा
Nirmal kumar awasthi
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