पता नहीं हम क्यों नही जानते हुए भी ये समझना नहीं चाहते कि हमें अपनी जननी स्वरूप धरती माता के अनुसार बदलना चाहिए,, प्रकृति जो हमारे लिए जीवनदायिनी है उसका पोषण,,और उसका संरक्षण करना हमारा नैतिक कर्तव्य है ,,,पर अब हमें शायद आदत सी पड़ गयी है हर नियम,,,हर कानून में कारण निकालने की ,,,हम शायद अपने शास्त्रों में लिखित परिभाषाओं को भूल रहे है ,,,या जानते हुए भी उनको भूलने का ढोंग करने पर विवश है,,,और इसी हठ या विवशता की वजह से हम अपना भविष्य जो हमारे बच्चों के रूप में हैं उसको अंधकार में धकेल रहे है ,,,
मैं ये भी जानता हूँ कि ये लेख पढ़ने के बाद कई लोग मुझसे सवाल जवाब करेंगे ,,तो उनसे मेरा बस यही एक सवाल,,,की हम अपने पूर्वजों से कैसा हरा भरा वातावरण उपहार स्वरूप प्राप्त किये,,,पर अपने बच्चों को हम क्या देकर जाने वाले है
ना पीने लायक पानी
ना सांस लेने लायक हवा
ना रहने लायक घर
ना ही संस्कार
ना सभ्यता
ना ही आचार विचार
ना रिश्तों की महत्ता
फिर क्या
जरा आंख बंद करके विचार कीजियेगा
2050 का भारत कैसा होगा
ये चुनौती हम सब के सामने है
Nirmal Earthcarefoundation Ngo
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8699208385
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