Sunday, October 20, 2019
Thursday, June 7, 2018
https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=312374079266120&id=133818627121667
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Friday, October 20, 2017
पता नहीं हम क्यों नही जानते हुए भी ये समझना नहीं चाहते कि हमें अपनी जननी स्वरूप धरती माता के अनुसार बदलना चाहिए,, प्रकृति जो हमारे लिए जीवनदायिनी है उसका पोषण,,और उसका संरक्षण करना हमारा नैतिक कर्तव्य है ,,,पर अब हमें शायद आदत सी पड़ गयी है हर नियम,,,हर कानून में कारण निकालने की ,,,हम शायद अपने शास्त्रों में लिखित परिभाषाओं को भूल रहे है ,,,या जानते हुए भी उनको भूलने का ढोंग करने पर विवश है,,,और इसी हठ या विवशता की वजह से हम अपना भविष्य जो हमारे बच्चों के रूप में हैं उसको अंधकार में धकेल रहे है ,,, मैं ये भी जानता हूँ कि ये लेख पढ़ने के बाद कई लोग मुझसे सवाल जवाब करेंगे ,,तो उनसे मेरा बस यही एक सवाल,,,की हम अपने पूर्वजों से कैसा हरा भरा वातावरण उपहार स्वरूप प्राप्त किये,,,पर अपने बच्चों को हम क्या देकर जाने वाले है ना पीने लायक पानी ना सांस लेने लायक हवा ना रहने लायक घर ना ही संस्कार ना सभ्यता ना ही आचार विचार ना रिश्तों की महत्ता फिर क्या जरा आंख बंद करके विचार कीजियेगा 2050 का भारत कैसा होगा ये चुनौती हम सब के सामने है Nirmal Earthcarefoundation Ngo www.earthcarengo.org 8699208385
पता नहीं हम क्यों नही जानते हुए भी ये समझना नहीं चाहते कि हमें अपनी जननी स्वरूप धरती माता के अनुसार बदलना चाहिए,, प्रकृति जो हमारे लिए जीवनदायिनी है उसका पोषण,,और उसका संरक्षण करना हमारा नैतिक कर्तव्य है ,,,पर अब हमें शायद आदत सी पड़ गयी है हर नियम,,,हर कानून में कारण निकालने की ,,,हम शायद अपने शास्त्रों में लिखित परिभाषाओं को भूल रहे है ,,,या जानते हुए भी उनको भूलने का ढोंग करने पर विवश है,,,और इसी हठ या विवशता की वजह से हम अपना भविष्य जो हमारे बच्चों के रूप में हैं उसको अंधकार में धकेल रहे है ,,,
मैं ये भी जानता हूँ कि ये लेख पढ़ने के बाद कई लोग मुझसे सवाल जवाब करेंगे ,,तो उनसे मेरा बस यही एक सवाल,,,की हम अपने पूर्वजों से कैसा हरा भरा वातावरण उपहार स्वरूप प्राप्त किये,,,पर अपने बच्चों को हम क्या देकर जाने वाले है
ना पीने लायक पानी
ना सांस लेने लायक हवा
ना रहने लायक घर
ना ही संस्कार
ना सभ्यता
ना ही आचार विचार
ना रिश्तों की महत्ता
फिर क्या
जरा आंख बंद करके विचार कीजियेगा
2050 का भारत कैसा होगा
ये चुनौती हम सब के सामने है
Nirmal Earthcarefoundation Ngo
www.earthcarengo.org
8699208385
Friday, September 8, 2017
जाने कितनों का घर उजाड़ा मैंने,,,,एक वृक्ष को काटकर के
जाने कितने पाप किये,,,सारे अपने आप किये,,
इसको तोड़ा,, उसको मरोड़ा,,कितनों को झकझोर दिए,,
हरियाली से रही घृणा,
मन की ना मिट पायी तृष्णा,,
प्यास थी जाने कैसी वो,,
पशुओं,,पक्षियों के श्राप लिए,,,
कल बाग़ हुआ करती थी यहाँ,,
गोरैया की किलकारी थी,,,
जब भी गुजरता था उस राह में तो,,
गिलहरी की देखती रहती थी,,,
चींटियों का भी झुण्ड,,उस राह से रोज गुजरता था,,
बिन शब्द कहे,,मैं बिन बोले,,जाने क्या बाते करता था,,
पक्षी भी थे,,गिलहरी थी,,चींटी भी थीं,, घोंसले भी थे,,
शायद ये उनका साथ ही था,,उनको मुझपर विस्वास भी था,,
उन पेड़ों उनका घरौंदा था,,,जिनको हमने काट दिए,,
वो रोये बहुत चिल्लाये थे,,,हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाए थे,,
हम हज़ारों है हम कहाँ जाये,,
जिन घोंसलों को बनाया है,,
इस पेड़ को मैंने सजाया है,,
इनमे मेरे अपने है,,,जाने कितनों के सपने है
जीवन भर का अरमान है
और इसमें बसे हमारे प्राण है
मैं था मनुष्य,,,था प्रतिघाती,,
विस्वास से मुझे था क्या लेना,,
मैंने उन पेड़ो को काट दिया,,
उन हज़ारों रोते हुए जीवों के,,,
हाँ जीवन में अन्धकार किया,,
जाने कितने पाप किये,,,सारे अपने आप किये,,
इसको तोड़ा,, उसको मरोड़ा,,कितनों को झकझोर दिए,,
जो पेड़ कल वायु के वेग के संग हँस रहे थे,,,मुश्करा रहे थे,,आज सीशविहीन रुदन कर रहे है Nirmal earthcarefoundation
जो पेड़ कल वायु के वेग के संग हँस रहे थे,,,मुश्करा रहे थे,,आज सीशविहीन रुदन कर रहे है
Nirmal earthcarefoundation
प्रकृति को क्षत-विक्षत करना आज की परंपरा बन गयी है Nirmal Earthcarefoundation Ngo
प्रकृति को क्षत-विक्षत करना आज की परंपरा बन गयी है
Nirmal Earthcarefoundation Ngo
Sunday, July 2, 2017
छोड़ के दुनियादारी,दो एक पेड़ लगाय। धरती हो हरी भरी,,जीवन स्वस्थ हो जाय।।
छोड़ के दुनियादारी,दो एक पेड़ लगाय।
धरती हो हरी भरी,,जीवन स्वस्थ हो जाय।।